बहुत तकलीफ होता है जब वह मेरे सामने किसी और से मिलते हैं मैं कुछ कर नहीं सकती लाचार सी रहती हूं क्योंकि उनके ऊपर मेरा हक नहीं है सिर्फ प्यार ही तो करती हूं शादी हो गई होती कुछ अधिकार भी होता
कभी सोचा ना था यूं छोड़ जाएंगे जो हर वक्त मेरे दीदार को बेचैन रहते हैं टूट कर बिखर गए शीशे की तरह दर्पण में खुद को पहचान नहीं पाते हैं